गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 248

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

षष्ठ: सर्ग:
धृष्ट-वैकुण्ठ:

द्वादश: सन्दर्भ

12. गीतम्

Prev.png

त्वदभिसरण-रभसेन वलन्ती।
पतति पदानि कियन्ति चलन्ती
नाथ हरे! सीदति... ॥2॥[1]

अनुवाद- श्रीराधा अपने अभिसरण के उत्साह से उत्सुक हो प्रसाधनादि कार्यों में व्यस्त होती हुई ज्यों ही कुछ कदम चलती हैं, त्यों ही गिर जाती हैं।

पद्यानुवाद
यह कहकर तुमसे मिलनेको,
ज्यों व्याकुल हो बढ़ती।
गिर पड़ती है पथमें क्षणमें,
क्षणमें है उठ पड़ती॥
हे हरि राधा आवास गृहे।
कब तक वियोगका वास गृहे॥

बालबोधिनी- हे श्रीकृष्ण! प्रसाधनादि कार्यों में लगी हुई श्रीराधा अभिसार करने के लिए बड़े वेग से उठती हैं, किन्तु विरह में अत्यन्त क्षीण होने के कारण विवश होकर वह कुछ ही कदम चलकर भूमि पर मूर्च्छित होकर गिर जाती हैं।

Next.png

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अन्वय- यद्येतादृशी सा तर्हि कथं ना गच्छतीत्याह त्वदभिसरण-रभसेन (तव अभिसरणे य: रभस: उत्साह: हर्षो वा तेन) वलन्ती (उत्सहमाना वलयुक्ता वा) [सती] कियन्ति पदानि चलन्ती [सामर्थ्याभावात् मूर्च्छिता] पतति [अत: स्वयमागन्तुमसमर्था] हे नाथ....एवं सर्वत्र] ॥2॥

संबंधित लेख

गीत गोविन्द -श्रील जयदेव गोस्वामी
सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                                 अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र    अः