गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 199

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

चतुर्थ: सर्ग:
स्निग्ध-मधुसूदन:

अथ नवम: सन्दर्भ
9. गीतम्

Prev.png

दिशि दिशि किरति सजल-कण-जालम्।
नयन-नलिनमिव विदलितनालम्
राधिका विरहे.... ॥4॥[1]

अनुवाद- मृणाल से विच्छिन्न होकर सजल कमलवत्र नयन-कमल को चारों दिशाओं में विक्षिप्त कर अश्रुकण की वृष्टि कर रही है।

पद्यानुवाद
आँखमें आँसू उमंगते
कमल-कण सरमें तरंगते
खोजती दिशि दिशि सहमते
प्रिय! कहाँ हो तुम विरमते?

बालबोधिनी- उसकी आँखें ऐसी लगती हैं, जैसे कमल हों, पर उस कमल का नाल विगलित हो गया है। आँसुओं से भरे नेत्र जलकणों से युक्त नीलकमलों के समान मनोहर लगते हैं। आँसुओं के तारों से दिशाएँ आबद्ध हो जाती हैं, एक जाल-सा तन जाता है, अवरुद्ध हो जाती हैं दिशाएँ! आपके आगमन की प्रतीक्षा में चारों ओर देखती रहती हैं कि आप किसी दिशा से आते हुए दिखायी पड़ जाएँ। नाल गल जाने पर जैसे कमल की स्थिति नहीं रहती, वैसे ही उनकी आँखें कहीं नहीं ठहरतीं। कहीं कोई आधार नहीं, जिस पर वह अपनी दृष्टि टिका सकें।

इस श्लोक में उपमा तथा उत्प्रेक्षा अलंकार हैं।

Next.png

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अन्वय- विदलितनालं (छिन्नवृन्तं) [नलिनमिव] दिशि दिशि (प्रतिदिशं) नयननलिनं सजलकणजालं (जलकणजालै: सह वर्त्तमानं यथातथा) किरति; [नयनादश्रुपात: पद्मात् नीरच्यूतिरिव प्रतिभातीत्यर्थ:] ॥4॥

संबंधित लेख

गीत गोविन्द -श्रील जयदेव गोस्वामी
सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                                 अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र    अः