गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 195

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

चतुर्थ: सर्ग:
स्निग्ध-मधुसूदन:

अथ अष्टम: सन्दर्भ

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पाण्डुवर्णा वह श्रीराधा अपने निवास-स्थान को विपिन समझ बैठी हैं। प्रिय-समागम न होने से विरह-विदग्धा वह इधर-उधर जाना चाहती है, किन्तु सामने बिछा हुआ है बहेलियारूपी सखियों का जाल, जिससे वह विवश हो मन मसोस कर रह जाती हैं। उसकी प्रिय सखियाँ ही उसके लिए व्याध-जाल के समान बन्धनकारी हो रही हैं। जैसे वन में लगी अग्नि को देखकर हरिणी घबराकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है, उसी प्रकार देह के सन्ताप के साथ मिलकर दीर्घ नि:श्वास दावाग्नि के समान अथवा उल्कापात के समान उन्हें तपा रहा है। ओह! ये नि:श्वास दावानल की ज्वाला के समान लगते हैं। मुख से केवल हाहाकार करती हैं। श्रीकृष्ण का सान्निध्य रहने पर जो कामदेव अनुकूल बना रहता है, वह तो शार्दुल-क्रीड़ा कर रहा है, यमराज जैसा लगता है, वह श्रीराधा को मानो मार डालना चाहता है।

शार्दूलविक्रीड़ित काम है, बाघ की तरह झपट्टा मारता हुआ उस मासूम हरिणी को और इस श्लोक का छन्द है शार्दूलविक्रीड़ित और यह पूरा छन्द ही जैसे कामदेव की क्रीड़ा हो।

श्रीराधा जी को हरिणी की उपमा देने में भी सार्थकता है। सखी कहना चाहती है कि बुद्धिमान व्यक्ति किसी स्नेहवान के साथ प्रेम करता है। श्रीराधा ने तो आपके साथ स्नेह किया है, स्नेह के सागर में सराबोर रहती हैं और आप कैसे स्नेह-रहित हैं। एकपक्षीय प्रेम तो कोई पशुजाति जीव ही कर सकता है। पुनश्च हरिणी तो वैसे ही देह से दुर्बल एवं किंकर्तव्यविमूढ़ होती है। निरीह मासूम श्रीराधा को श्रीकृष्ण का स्नेह सता रहा है और ऊपर से उस पर काम अपना पराक्रम दिखा रहा है। यह तो वही विचारी श्रीराधा हैं जो नि:स्पृह व्यक्ति से प्रेम करती हैं।

शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। लुप्तोत्मा एवं विरोधाभास अलंकार है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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गीत गोविन्द -श्रील जयदेव गोस्वामी
सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

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