गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 165

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

तृतीय: सर्ग:
मुग्ध-मधुसूदन:

अथ सप्तम सन्दर्भ
7. गीतम्

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तन्वि खिन्नामसूयया हृदयं तवाकलयामि।
तन्ना वेद्मि कुतो गतासि तेन ते नुनयामि
हरि हरि हतादरतया... ॥5॥[1]

अनुवाद- हे कृशांगि! प्रतीत होता है, तुम्हारा हृदय असूया से कलुषित हो गया है, परन्तु मैं क्या करूँ, तुम अभिमानिनी होकर कहाँ चली गयी हो पर मैं नहीं जानता हूँ कि तुम्हारे मान को दूर करने के लिए कैसे अनुनय विनय करूँ?

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अन्वय- हे तन्वि (कृशांगि) तव हृदयं (चेत:) असूयया (तदुत्कर्षज्ञानारोद्यमरूपे गुणे दोषारोपणरूपया ईर्ष्यया) खिन्नाम् (नितरां व्यथितम्) आकलयामि (सम्भावयामि); तत्र (तस्मात्) कुत: (कुत्र) गतासि इति न वेद्मि (न जानामि); तेन (हेतुना) ते (तुभ्यं) न अनुनयामि (पादग्रहणादिना न क्षमापयामि) ॥5॥

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सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

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