गीत गोविन्द -जयदेव पृ. 123

श्रीगीतगोविन्दम्‌ -श्रील जयदेव गोस्वामी

द्वितीय सर्ग
अक्लेश-केशव:

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विहरति वने राधा साधारण-प्रणये हरौ
विगलित-निजोत्कर्षादीर्ष्यावशेन गतान्यत:।
क्वचिदपि लताकुञ्जे गुञ्जन्मधुव्रत-मण्डली-
मुखर-शिखरे लीना दीनाप्युवाच रह: सखीम् ॥1॥[1]

अनुवाद- समस्त गोपांगनाओं के साथ एक समान स्नेहमय श्रीकृष्ण को वृन्दाविपिन में विहार करते हुए देखकर अन्य गोपिकाओं की अपेक्षा अपना वैशिष्ट्य न होने से प्रणय-कोप के आवेश में वहाँ से दूर जाकर भ्रमर-मण्डली से गुंजित दूसरे लताकुंज में श्रीराधा छिप गयी एवं अति दीन होकर गोपनीय बातों को भी सखी से कहने लगी।

पद्यानुवाद
राधा बोल उठी मनकी
लख हरि गोपीजनकी क्रीड़ा निशिदिन वृन्दावनकी
अलिकुल-गुञ्जित लता-कुंञ्ज में छिपकर जीवन-धनकी।
लीला से ईर्षाहत होकर भूली सुध-बुध तनकी
राधा बोल उठी मनकी ॥1॥

बालबोधिनी- इस द्वितीय सर्ग का नाम अक्लेश-केशव है। तात्पर्य यह है कि स्वयं-भगवान रसिक-शेखर श्रीकृष्ण सदैव क्लेशरहित हैं। उनमें क्लेश का संक्लेश मात्र भी नहीं है। भगवान के दो असाधारण चिह्न हैं-

1. अखिलहेयप्रत्यनिकत्त्व, अर्थात भगवान से किसी प्रकार के क्लेश-कर्म-विपाक आदि प्राकृतिक दोषों का सम्पर्क नहीं होता है। वे सभी दोषों के प्रत्यनीक हैं अर्थात प्रबल शत्रु हैं। योगसूत्रकार ने भी साधनपाद में कहा है-

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।

अर्थात क्लेश कर्म, उनके परिणाम तथा वासनादि दोषों के सम्पर्क से रहित पुरुषविशेष को ईश्वर शब्द से अभिहित किया जाता है।

2. अखिल कल्याण गुणाकरत्व श्रीकृष्ण सम्पूर्ण संसार का कल्याण करने वाले अप्राकृत सद्गुणों के आकर हैं।
इन्हीं अर्थों के कारण इस सर्ग का नाम अक्लेश-केशव है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अन्वय- [अथ सखीवचनं निशम्य श्रीकृष्णस्य साधारण-विहरणं विलोक्य ईर्ष्योदयात् तद्दर्शनमप्यसहमाना अन्यतोगता राधा सखीमुवाच] साधारण-प्रणये (साधारण: समान: सर्वास्वेव गोपा नासु इति शेष: प्रणय: प्रीति: यस्य तथाभूते) हरौ (कृष्णे) वने विहरति (विहारं कुर्वति सति) राधा विगलित-निजोत्कर्षात्र (विगलितो निजोत्कर्ष: अहमेव असाधारणी प्रिया इत्येवं रूपेण यतस्तस्मादित्यर्थ: (ईर्षावशेन) (अन्योत्कर्षा-सहिष्णुतया) दीना (कातरा) [सती] [प्रणयतारतम्यादपि विहारस्य साम्यव्यवहरणात् श्रीकृष्णस्य स्वभावान्यथात्वदर्शनाक्षमतया] अन्यत: (अन्यस्मिन्) गुंजन्मधुव्रत-मण्डली-मुखर-शिखरे (गुञ्जन्तो ये मधुव्रता: (भ्रमरास्तेषां मण्डलीभि: श्रेणीभि: मुखरं ध्वनितं शिखरम् अग्रं यस्य तादृशे) क्वचिदपि लताकुंजे लीना लुक्कायिता सती) रह: (निर्जने) सखीम् [अत्यन्तगोप्यमपि] उवाच ॥1॥

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सर्ग नाम पृष्ठ संख्या
प्रस्तावना 2
प्रथम सामोद-दामोदर: 19
द्वितीय अक्लेश केशव: 123
तृतीय मुग्ध मधुसूदन 155
चतुर्थ स्निग्ध-मधुसूदन 184
पंचम सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष: 214
षष्ठ धृष्ठ-वैकुण्ठ: 246
सप्तम नागर-नारायण: 261
अष्टम विलक्ष-लक्ष्मीपति: 324
नवम मुग्ध-मुकुन्द: 348
दशम मुग्ध-माधव: 364
एकादश स्वानन्द-गोविन्द: 397
द्वादश सुप्रीत-पीताम्बर: 461

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