गीता माता -महात्मा गांधी पृ. 245

गीता माता -महात्मा गांधी

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2 : गीता से प्रथम परिचय


विलायत में रहते हुए कोई एक साल हुआ होगा, इस बीच दो थियोसॉफिस्ट मित्रों से मुलाकात हुई। दोनों सगे भाई थे और अविवाहित थे। उन्होंने मुझसे गीता की बात चलाई। उन दिनों ये एडविन आरनॉल्ड-कृत गीता के अंग्रेजी अनुवाद को पढ़ रहे थे, पर मुझे उन्होंने अपने साथ संस्कृत में गीता पढ़ने के लिए कहा। मैं लज्जित हुआ, क्योंकि मैंने तो गीता संस्कृत भाषा में नहीं पढ़ी थी। मुझे उनसे यह बात झेंपते हुए कहनी पड़ी; पर साथ यह भी कहा कि मैं आपके साथ पढ़ने के लिए तैयार हूँ। यों तो मेरा संस्कृत-ज्ञान नहीं के बराबर है, फिर भी मैं इतना समझ सकूंगा कि अनुवाद कहीं गड़बड़ होगा तो वह बता सकूं। इस तरह इन भाइयों के साथ मेरा गीता-वाचन आरंभ हुआ। दूसरे अध्याय के अंतिम श्लोकों में:


ध्यायतो विषयान्पुंस: संगस्तेषूपजायते।
सगात्संजायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥[1]

इन श्लोकों का मेरे दिल पर गहरा असर हुआ। बस कानों में उनकी ध्वनि दिन-रात गूँजा करती। तब मुझे प्रतीत हुआ कि भगवद्गीता तो अमूल्य ग्रंथ है। यह धारणा दिन-दिन अधिक दृढ़ होती गई और अब तो तत्त्व ज्ञान के लिए मैं उसे सर्वोत्तम ग्रंथ मानता हूँ। निराशा के समय इस ग्रंथ ने मेरी अमूल्य सहायता की है। यों इसके लगभग तमाम अंग्रेजी अनुवाद मैं पढ़ गया हूं; परन्तु एडविन आरनॉल्ड का अनुवाद सबमें श्रेष्ठ मालूम होता है। उन्होंने मूल ग्रंथ के भावों की अच्छी रक्षा की है और तिस पर भी वह अनुवाद जैसा नहीं मालूम होता। फिर भी यह नहीं कह सकते कि इस समय मैंने भगवद्गीता का अच्छा अध्ययन कर लिया है। उसका रोजमर्रा पाठ तो वर्षों बाद शुरू हुआ।

‘आत्मकथा,’ नवां संस्करण

पृष्ठ 71

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. विषय का चिंतन करने से पहले तो उसके साथ संग पैदा होता है और संग से काम की उत्पत्ति होती है। कामना के पीछे-पीछे क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृतिभ्रम और स्मृतिभ्रम से बुद्धि का नाश होता है और अंत में पुरुष स्वयं नष्ट हो जाता है।

संबंधित लेख

गीता माता
अध्याय पृष्ठ संख्या
गीता-बोध
पहला अध्याय 1
दूसरा अध्‍याय 3
तीसरा अध्‍याय 6
चौथा अध्‍याय 10
पांचवां अध्‍याय 18
छठा अध्‍याय 20
सातवां अध्‍याय 22
आठवां अध्‍याय 24
नवां अध्‍याय 26
दसवां अध्‍याय 29
ग्‍यारहवां अध्‍याय 30
बारहवां अध्‍याय 32
तेरहवां अध्‍याय 34
चौदहवां अध्‍याय 36
पन्‍द्रहवां अध्‍याय 38
सोलहवां अध्‍याय 40
सत्रहवां अध्‍याय 41
अठारहवां अध्‍याय 42
अनासक्तियोग
प्रस्‍तावना 46
पहला अध्याय 53
दूसरा अध्याय 64
तीसरा अध्याय 82
चौथा अध्याय 93
पांचवां अध्याय 104
छठा अध्याय 112
सातवां अध्याय 123
आठवां अध्याय 131
नवां अध्याय 138
दसवां अध्याय 147
ग्‍यारहवां अध्याय 157
बारहवां अध्याय 169
तेरहवां अध्याय 174
चौहदवां अध्याय 182
पंद्रहवां अध्याय 189
सोलहवां अध्याय 194
सत्रहवां अध्याय 200
अठारहवां अध्याय 207
गीता-प्रवेशिका 226
गीता-पदार्थ-कोश 238
गीता की महिमा
गीता-माता 243
गीता से प्रथम परिचय 245
गीता का अध्ययन 246
गीता-ध्यान 248
गीता पर आस्था 250
गीता का अर्थ 251
गीता कंठ करो 257
नित्य व्यवहार में गीता 258
भगवद्गीता अथवा अनासक्तियोग 262
गीता-जयन्ती 263
गीता और रामायण 264
राष्ट्रीय शालाओं में गीता 266
अहिंसा परमोधर्म: 267
गीता जी 270
अंतिम पृष्ठ 274

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