गर्ग संहिता पृ. 752

गर्ग संहिता

अश्‍वमेध खण्‍ड : अध्याय 34

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राजेंद्र ! इस प्रकार वहाँ देवताओं को भी विस्यम में डाल देने वाला संग्राम छिड़ गया। कार्तिक मास के संपूर्ण दिन वहाँ युद्ध में व्यतीत हो गए। राजन् ! बारंबार अपना धनुष टंकारते हुए बल्वल ने कुपित हो रणभूमि में इंद्र नील को तीन और हेमांगद को छ: बाण मारे। अनुशाल्व को दस, अक्रूर को दस, गद को बारह, युयुधान को पांच, कृतवर्मा को पाँच, उद्धव को दस और प्रद्युम्न को सौ बाणों द्वारा समरांगण में उस असुर ने घायल कर दिया। उसके बाणों के आघात से रथों सहित वे सभी वीर दो घड़ी तक चक्कर काटते रहे। रणभूमि में उनके घोड़े मर गए तथा रथ चूर–चूर हो गए। मानद नरेश ! उसके हाथ की फुर्ती देखकर अनिरुद्ध आदि समस्त यादव चकित हो गए। फिर वे सब के सब दूसरे रथों पर आरूढ़ हो गए ।

राजन् ! उधर बल्वल भी दूसरे–दूसरे वीरों को देखने के लिए चला। तब क्रोध से लाल आंखें किए अनिरुद्ध ने कहा– ओ दैत्य ! मेरे सामने खड़ा रह, खड़ा रह। पराक्रम दिखा कर तू कहाँ जाएगा ? मेरे तीखे बाणों को भी देख ले। अनिरुद्ध की यह बात सुनकर दैत्य युवराज कुनंदन बल्वल के देखते–देखते शीघ्र ही बोल उठा ।

राजपुत्र ने कहा– प्रद्युम्ननंदन ! रणभूमि में दैत्यराज को देखने की योग्यता तुममें नहीं है। इसलिए पहले इस युद्धस्थल में तुम मेरा बल देख लो ।

अनिरुद्ध बोले– दैत्य कुमार ! तू अभी बालक है। युद्ध करने की योग्यता नहीं रखता है। अत: अपने घर जाकर कृत्रिम खिलौनों से खेल ।

राजकुमार ने कहा– आज तुम यहाँ बड़े-बड़े वीरों के साथ मुझ बालक का खेल देखो। यदि घर जाकर खेलूँगा तो वहाँ कोई नहीं देखेगा ।

ऐसा कहकर कुनंदन ने अपने प्रचण्ड कोदण्ड पर सौ सायक रखे और उनके द्वारा अपना बल दिखाते हुए उसने रथ पर बैठे हुए अनिरुद्ध को घायल कर दिया। उन बाणों के आघात से सारथि, घोड़े तथा रथ के साथ वे स्वयं भी आकाश मार्ग में चक्कर काटते हुए कपिलाश्रम में जा गिरे। अनिरुद्ध के चलने जाने पर तत्काल हाहाकार मच गया ।

तब रणस्थल में कुपित हुए साम्ब आदि यादव उस दैत्य कुमार को मारने के लिए आए। उन बहुसंख्यक योद्धाओं को आया देख युवराज को बड़ा हर्ष हुआ। उस बलवान वीर ने युद्धस्थल में साम्ब को दस, मधु को पांच, बृहदबाहु को तीन, चित्रभानु को पाँच, वृक को दस, अरुण को सात, संग्रामजित को पाँच, सुमित्र को तीन, दीप्तिमान को तीन, भानु को पाँच, वेदबाहु को पाँच, पुष्कर को सात, श्रुतदेव को आठ, सामने खड़े हुए सुनंदन को बीस, विरूप को दस, चित्रबाहु को नौ, न्यग्रोध को दस तथा कवि को नौ तीखें बाणों द्वारा घायल कर दिया। साथ ही उस मानी कुनंदन ने बड़ी प्रसन्नता के साथ विजय सूचक शंख ध्वनि की। उसके बाणों से रथ और घोड़ों सहित चक्कर काटते हुए कोई एक योजन पर गिरे, कोई पाँच कोस पर और कोई दो योजन पर ।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

गर्ग संहिता
क्रम संख्या विषय पृष्ठ संख्या
गोलोक खण्ड
1 नारद जी के द्वारा अवतार-भेद का निरूपण 1
2 ब्रह्मादि देवों द्वारा गोलोक धाम का दर्शन 5
3 भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में श्रीविष्णु आदि का प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति; भगवान का अवतार लेने का निश्चय; श्रीराधा की चिंता और भगवान का उन्हें सांत्वना-प्रदान 11
4 नन्द आदि के लक्षण; गोपीयूथ का परिचय; श्रुति आदि के गोपीभाव की प्राप्ति में कारणभूत पूर्व प्राप्त वरदानों का विवरण 15
5 भिन्न-भिन्न स्थानों तथा विभिन्न वर्गों की स्त्रियों के गोपी होने के कारण एवं अवतार-व्यवस्था का वर्णन 21
6 कालनेमि के अंश से उत्पन्न कंस के महान बल पराक्रम और दिग्विजय का वर्णन 24
7 कंस की दिग्विजय-शम्बर, व्योमासुर, बाणासुर, वत्सासुर, कालयवन तथा देवताओं की पराजय 29
8 सुचन्द्र और कलावती के पूर्व-पुण्य का वर्णन, उन दोनों का वृषभानु तथा कीर्ति के रूप में अवतरण 35
9 गर्गजी की आज्ञा से देवक का वसुदेव जी के साथ देवकी का विवाह करना; विदाई के समय आकाशवाणी सुनकर कंस का देवकी को मारने के लिये उद्यत होना और वसुदेव जी की शर्त पर जीवित छोड़ना 38
10 कंस के अत्याचार; बलभद्र जी का अवतार तथा व्यासदेव द्वारा उनका स्तवन 41
11 भगवान वसुदेव देवकी में आवेश; देवताओं द्वारा उनका स्तवन; आविर्भावकाल; अवतार विग्रह की झाँकी; वसुदेव देवकी कृत भगवत-स्तवन; भगवान द्वारा उनके पूर्वजन्म के वृतांत वर्णन पूर्वक अपने को नन्द भवन में पहुँचाने का आदेश; कंस द्वारा नन्द कन्या योगमाया से कृष्ण के प्राकट्य की बात जानकर पश्चात्ताप पूर्वक वसुदेव देवकी को बन्धन मुक्त करना, क्षमा माँगना और दैत्यों को बाल वध का आदेश देना। 45
12 दोनों ओर के स्वजनों को देखकर उनके मरण की आशंका से अर्जुन का शोकाकुल होना और कुलनाश, कुलधर्मनाश तथा वर्णसंकरता के विस्तार आदि दुष्परिणामों को बतलाते हुए धनुष-बाण छोड़कर बैठ जाना 54
13 पूतना का उद्धार 58
14 शकट भंजन; उत्कच और तृणार्वत का उद्धार; दोनों के पूर्वजन्मों का वर्णन 61
15 यशोदा द्वारा श्रीकृष्ण के मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दर्शन; नन्द और यशोदा के पूर्व-पुण्य का परिचय; गर्गाचार्य का नन्द-भवन में जाकर बलराम और श्रीकृष्ण के नामकरण संस्कार करना तथा वृषभानु के यहाँ जाकर उन्हें श्रीराधा-कृष्ण के नित्य-सम्बन्ध एवं माहात्म्य का ज्ञान कराना 68
16 भाण्डीर वन में नन्दजी के द्वारा श्री राधाजी की स्तुति: श्री राधा और श्रीकृष्ण का ब्रह्माजी के द्वारा विवाह; ब्रह्माजी के द्वारा श्रीकृष्ण का स्तवन तथा नवदम्पति की मधुर लीलाएँ 75
17 श्रीकृष्ण की बाल-लीला में दधि-चोरी का वर्णन 82
18 नन्दा, उपनन्दत और वृषभानुओं का परिचय तथा श्रीकृष्ण की मृदभक्षण लीला 86
19 दामोदर कृष्ण, का उलूखल- बन्धतन तथा उनके द्वारा यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार 88
20 दुर्वासा द्वारा भगवान की माया का एवं गोलोक में श्रीकृष्ण का दर्शन तथा श्रीनन्द नन्दरनस्तोात्र 91
वृन्दावन खण्ड
1 सन्नन्दका गोपों को महावन से वृन्दावन में चलने की सम्मति देना और व्रज मण्डल के सर्वाधिक माहात्म्य का वर्णन करना 95
2 गिरिराज गोवर्धन की उत्पत्ति तथा उसका व्रजमण्डहल में आगमन 100
3 श्री यमुना जी का गोलोक से अवतरण और पुन: गोलोक धाम में प्रवेश 104
4 श्री बलराम और श्रीकृष्ण के द्वारा बछड़ों का चराया जाना तथा वत्सासुर का उद्धार 107
5 वकासुर का उद्धार 109
6 अघासुर का उद्धार और उसके पूर्वजन्म का परिचय 113
7 ब्रह्मा जी के द्वारा गौओं, गोवत्सों एवं गोप-बालकों का हरण 113
8 ब्रह्मा जी के द्वारा श्रीकृष्ण के सर्वव्यापी विश्वात्मा स्वरूप का दर्शन 115
9 ब्रह्माजी के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति 119
10 यशोदा जी की चिंता; नन्द द्वारा आश्वासन तथा ब्राह्मणों को विविध प्रकार के दान देना; श्री बलराम तथा श्रीकृष्ण का गोचारण 124
11 धेनुकासुर का उद्धार 127
12 श्रीकृष्ण द्वारा कालियदमन तथा दावानल-पान 130
13 मुनिवर वेदशिरा और अश्वशिरा का परस्पर के शाप से क्रमश: कालियनाग और काकभुशुण्ड होना तथा शेषनाग का भूमण्‍डल को धारण करना 132
14 कालिय का गरूड़ के भय से बचने के लिये यमुना-जल में निवास का रहस्य 135
15 श्रीराधा का गवाक्ष मार्ग से श्रीकृष्ण के रूप का दर्शन करके प्रेम-विव्हल; ललिता का श्रीकृष्ण से राधा की दशा का वर्णन करना और उनकी आज्ञा के अनुसार लौटकर श्रीराधा को श्रीकृष्ण - प्रीत्यर्थ सत्कर्म करने की प्रेरणा देना 138
16 तुलसी का माहात्म्य, श्रीराधा द्वारा तुलसीसेवन-व्रत का अनुष्ठान तथा दिव्य तुलसी देवी का प्रत्यक्ष प्रकट हो श्रीराधा को वरदान देना 142
19 श्रीकृष्ण का गोपदेवी के रूप से वृषभानु-भवन में जाकर श्रीराधा से मिलना 144
19 श्रीकृष्ण के द्वारा गोपदेवी रूप से श्रीराधा के प्रेम की परीक्षा तथा श्रीराधा को श्रीकृष्ण का दर्शन 147
19 रासक्रीड़ा का वर्णन 151
20 श्रीराधा और श्रीकृष्ण के परस्पर श्रृंगार-धारण, रास, जलविहार एवं वनविहार का वर्णन 154
21 गोपंगनाओं के साथ श्रीकृष्ण का वन-विहार, रास-क्रीड़ा; मानवती गोपियों को छोड़कर श्रीराधा के साथ एकांत-विहार तथा मानिनी श्रीराधा को भी छोड़कर उनका अंतर्धान होना 157
22 गोपांगनाओं श्रीकृष्ण का स्तवन; भगवान का उनके बीच में प्रकट होना; उनके पूछने पर हंसमुनि के उद्धार की कथा सुनाना तथा गोपियों को क्षीरसागर श्वेतद्वीप के नारायण स्वरूपों का दर्शन कराना 160
23 कंस और शंखचूड़ में युद्ध तथा मैत्री का वृत्तांत; श्रीकृष्ण द्वारा शंखचूड़ का वध 163
24 रास-विहार तथा आसुरि मुनि का उपाख्यान 166
25 शिव और आसुरि का गोपीरूप से रासमण्‍डल में श्रीकृष्ण का दर्शन और स्तवन करना तथा उनके वरदान से वृन्दावन में नित्य-निवास पाना 169
26 श्रीकृष्ण का विरजा के साथ विहार; श्रीराधा के भय से विरजा का नदी रूप होना, उसके सात पुत्रों का उसी शाप से सात समुद्र होना तथा राधा के शाप से श्रीदामा का अंशत: शंखचूड़ होना 172
गिरिराज खण्‍ड
1 श्रीकृष्‍ण के द्वारा गोवर्धन पूजन का प्रस्‍ताव और उसकी विधि का वर्णन 175
2 गोपों द्वारा गिरिराज पूजन का महोत्‍व 178
3 श्रीकृष्‍ण का गोवर्धन पर्वत को उठाकर इन्‍द्र के द्वारा क्रोधपूर्वक करायी गयी घोर जलवृष्टि से रक्षा करना 180
4 इन्‍द्र द्वारा भगवान श्रीकृष्‍ण की स्‍तुति तथा सुरभि ओर ऐरावत द्वारा उनका अभिषेक 182
5 गोपों का श्रीकृष्‍ण के विषय में संदेह मूलक विवाद तथा श्रीनन्‍दराज एवं वृषभानुवर के द्वारा समाधान 185
6 गोपों का वृषभानुवर के वैभव की प्रशंसा करके नन्‍दनन्‍दन की भगवत्‍ता परीक्षण करने के लिये उन्‍हें प्रेरित करना और वृषभानुवर का कन्‍या के विवाह के लिये वर को देने के निमित्‍त बहुमूल्‍य एवं बहुसंख्‍यक मौक्कित-हार भेजना तथा श्रीकृष्‍ण की कृपा से नन्‍दराज का वधू के लिये उनसे भी अधिक मौक्किकराशि भेजना 188
7 गिरिराज गोवर्धन सम्‍बन्‍धी तीर्थों का वर्णन 191
8 विभिन्‍न तीर्थों में गिरिराज के विभिन्‍न अंगों की स्थित का वर्णन 194
9 गिरिराज गोवर्धन की उत्‍पत्ति का वर्णन 195
10 गोवर्द्धन-शिला के स्‍पर्श से एक राक्षस का उद्धार तथा दिव्‍यरूपधारी उस सिद्ध मुख से गोवर्द्धन की महिमा का वर्णन 199
11 सिद्ध के द्वारा अपने पूर्वजन्‍म के वृत्‍तान्‍त का वर्णन तथा गोलोक से उतरे हुए विशाल रथ पर आरूढ़ हो उसका श्रीकृष्‍ण-लोक में गमन 202
माधुर्य खण्‍ड
1 श्रुतिरूपा गोपियों का वृतान्‍त, उनका श्रीकृष्‍ण और दुर्वासा मुनि की बातों में संशय तथा श्रीकृष्‍ण द्वारा उसका निराकरण 204
2 ऋषिरूपा गोपियों का उपाख्‍यान- वंगदेश के मंगल-गोप की कन्‍याओं का नन्‍दराज के व्रज में आगमन तथा यमुनाजी के तट पर रास मण्‍डल में प्रवेश 209
3 मैथिलीरूपा गोपियों का आख्‍यान, चीरहरणलीला और वरदान प्राप्ति 210
4 कोसल प्रान्‍तीय स्त्रियों का व्रज में गोपी होकर श्रीकृष्‍ण के प्रति अनन्‍य भाव से प्रेम करना 212
5 अयोध्‍यावासिनी गोपियों के आख्‍यान के प्रसंग में राजा विमल की संतान के लिये‍ चिन्‍ता तथा महामुनि याज्ञवल्‍क्‍य द्वारा उन्‍हें बहुत-सी पुत्री होने का विश्‍वास दिलाना 213
6 अयोध्‍यापुरवासिनी स्त्रियों का राजा विमल के यहाँ पुत्री रूप से उत्‍पन्‍न होना, उनके विवाह के लिये राजा का मथुरा में श्रीकृष्‍ण को देखने के‍ निमित्‍त दूत भेजना, वहाँ पता न लगने पर भीष्‍मजी से अवतार-रहस्‍य जानकर उनका श्रीकृष्‍ण के पास दूत प्रेषित करना 215
7 राजा विमल का संदेश पाकर भगवान श्रीकृष्‍ण का उन्‍हें दर्शन और मोक्ष प्रदान करना तथा उनकी राजकुमारियों को साथ लेकर व्रजमण्‍डल में लौटना 218
8 यज्ञसीतास्‍वरूपा गोपियों के पूछने पर श्रीराधा का श्रीकृष्‍ण की प्रसन्‍नता के लिये एकादशी-व्रत का अनुष्‍ठान बताना ओर उसके विधि, नियम और माहात्‍म्‍य का वर्णन करना 215
9 पूर्वकाल में एकादशी का व्रत करके मनोवांछित फल पाने वाले पुण्‍यात्‍माओं का परिचय तथा यज्ञसीता स्‍वरूपा गोपिकाओं को एकादशी व्रत के प्रभाव से श्रीकृष्‍ण सांनिध्‍य की प्राप्ति 224
10 पुलिन्‍द कन्‍यारूपिणी गोपियों के सौभाग्‍य का वर्णन 226
11 लक्ष्‍मी जी की सखियों का वृषभानुओं के घरों में कन्‍या रूप से उत्‍पन्‍न होकर माघ मास के व्रत से श्रीकृष्‍ण को रिझाना और पाना 228
12 दिव्‍यादिव्‍य, त्रिगुणवृत्तिमयी भूतल-गोपियों का वर्णन तथा श्रीराधा सहित गोपियों की श्रीकृष्‍ण के साथ होली 230
13 देवांगना स्‍वरूपा गोपियाँ 234
14 कौरव-सेना से पीड़ित रंगोजि गोप का कंस की सहायता से व्रजमण्‍डल की सीमा पर निवास तथा उसकी पुत्री रूप में जालंधरी गोपियों का प्राकट्य 233
15 बर्हिष्‍मतीपुरी आदि की वनिताओं का गोपीरूप में प्राकट्य तथा भगवान के साथ उनका रा‍सविलास, मांधाता और सौभरिके संवाद में यमुना-पञ्चांग की प्रस्‍तावना 236
16 श्री यमुना-कवच 238
17 श्री यमुना का स्‍त्रोत 239
18 यमुना जी के जप और पूजन के लिये पटल और पद्धति का वर्णन 241
19 यमुना-सहस्‍त्रनाम 243
20 बलदेवजी के हाथ से प्रलम्‍बासुर का वध तथा उसके पूर्वजन्‍म का परिचय 295
21 दावानल से गौओं और ग्‍वालों का छुटकारा तथा विप्रपत्नियों को श्रीकृष्‍ण का दर्शन 297
22 श्रीकृष्‍ण का नन्‍दराज को वरूणलोक से ले आना और गोप-गोपियों को वैकुण्‍ठधाम का दर्शन कराना 299
23 अम्बिका वन में अजगर से नन्‍दराज की रक्षा तथा सुदर्शन-नामक विद्याधर का उद्धार 300
24 अरिष्‍टासुर और व्‍योमासुर का वध तथा माधुर्य खण्‍ड का उपसंहार 301
मथुरा खण्‍ड
1 कंस का नारद जी के कथनानुसार बलराम और श्रीकृष्‍ण को अपना शत्रु समझकर वसुदेव-देवकी को कैद करना, उन दोनों भाइयों को मारने की व्‍यवस्‍था में लगना तथा उन्‍हें मथुरा ले आने के लिये अक्रूरजी को नन्‍द के व्रज में जाने की आज्ञा देना 303
2 केशी का वध 306
3 अक्रूर का नन्‍दग्राम-गमन, मार्ग में उनकी बलराम-श्रीकृष्‍ण भेंट तथा उन्‍हीं के साथ नन्‍द-भवन में प्रवेश, श्रीकृष्‍ण से बातचीत और उनका मथुरा-गमन के लिये निश्चय, मथुरा-यात्रा की चर्चा सब ओर फैल जाने पर गोपियों का विरह की आशंका से उद्विग्न हो उठना 308
4 श्रीकृष्‍ण का गोपियों के घरों में जाकर उन्‍हें सान्‍त्‍वना देना तथा मार्ग में रथ रोककर खड़ी हुई गोपांगनाओं को समझाकर उनका मथुरापुरी की ओर प्रस्थित होना 311
5 अक्रूर को भगवान श्रीकृष्‍ण के परब्रह्मस्‍वरूप का साक्षात्‍कार तथा उनकी स्‍तुति, श्रीकृष्‍ण का ग्‍वालबालों के साथ पुरी-दर्शन के लिये जाना, नागरी, स्त्रियों का उनपर मोहित होना तथा भगवान के हाथ से एक रजक का उद्धार 314
6 सुदामा माली और कुब्‍जा पर कृपा, धनुर्भंग तथा मथुरा की स्त्रियों पर श्रीकृष्‍ण के मधुर-मोहन रूप का प्रभाव 318
7 मल्‍ल क्रीड़ा महोत्‍सव की तैयारी, रंगद्वार पर कुवलया पीड़ का वध तथा श्रीकृष्‍ण और बलराम का चाणूर और मुष्टिक के साथ मल्‍लयुद्ध में प्रवृत्त होना 322
8 चाणूर-मुष्टिक आदि मल्‍लों का तथा कंस और उसके भाइयों का वध 326
9 श्रीकृष्‍णा द्वारा वसुदेव देवकी की बन्‍धन से मुक्ति, श्रीकृष्‍ण और बलराम का गुरूकुल में विद्याध्‍ययन तथा गुरूदक्षिणा के रूप में गुरु के मरे हुए पुत्र को यमलोक से लाकर लौटाना, श्रीक्रूर को हस्तिनापुर भेजना तथा कुब्‍जा का मनोरथ पूर्ण करना 330
10 धोबी, दर्जी और सुदामा माली के पूर्वजन्‍म का परिचय 334
11 कुब्‍जा और कुवलयापीड के पूर्वजन्‍मगत वृतान्‍त का वर्णन 336
12 चाणूर आदि मल्‍ल, कंस के छोटे भाइयों तथा पंचजन दैत्‍य के पूर्वजन्‍मगत वृतान्‍त का वर्णन 338
13 श्रीकृष्‍ण की आज्ञा से उद्धव का व्रज में जाना और श्रीदामा आदि सखाओं का उनसे श्रीकृष्‍ण विरह के दु:ख का निवेदन 340
14 उद्धवका श्रीकृष्‍ण-सखाओं को आश्वासन, नन्‍द और यशोदा से बातचीत तथा उनकी प्रेम-लक्षणा-भक्ति से चकित होकर उद्धव का उन्‍हें श्रीकृष्‍ण के चरित्र सुनाना 343
15 गोपांग्‍नाओं के साथ उद्धव का कदली-वन में जाना और वहाँ उनकी स्‍तुति करके श्रीकृष्‍ण द्वारा भेजे गये पत्र अर्पित करना 347
16 उद्धव द्वारा श्रीराधा तथा गोपीजनों को आश्वासन 351
17 श्रीकृष्‍ण को स्‍मरण करके श्रीराधा तथा गोपियों के करूण उद्गार 353
18 गोपियों के उद्गार तथा उनसे विदा लेकर उद्धव का मथुरा को लौटना 357
19 श्रीकृष्‍ण का उद्धव के साथ व्रज में प्रत्‍यागमन और यमुना-तट पर गौओं का उनके रथ को चारों ओर से घेर लेना, गोपों के साथ उनकी भेंट, नन्‍दगाँव से नन्‍दरायजी एवं यशोदा-का गोपों एवं गोपियों को लेकर गाजे-बाजे के साथ उनकी अगवानी के लिये निकलना तथा सबके साथ श्रीकृष्‍ण का नन्‍द नगर में प्रवेश 360
20 श्रीकृष्ण का कदली-वन मे श्रीराधा और गोपियों के साथ मिलन, रासोत्सव तथा उसी प्रसंग मे रोहिताचल पर महामुनि ऋभु का मोक्ष 363
21 श्रीकृष्ण का की द्रवरूपता के प्रसंग में नारदजी का उपाख्‍यान 367
22 नारद का अनेक लोकों में होते हुए गोलोक में पहुँचकर भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी कला का प्रदर्शन करना तथा श्रीकृष्ण का द्रवरूप होना 370
23 श्री कृष्ण का व्रज से लौटकर मथुरा में आगमन 710
24 बलदेव जी द्धारा कोल दैत्य का वध; उनकी गंगा तटवर्ती तीर्थों में यात्रा; माण्डूक देव को वरदान और भावी वृत्तान्त की सूचना देना; फिर गंगा के अन्यान्य तीर्थों में स्नान-दान करके मथुरा में लौट जाना 375
25 मथुरापुरी का माहात्म्य मथुरा खण्ड का उपसंहार 382
द्वारका खण्‍ड
1 जरासंध का विशाल सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण; श्री कृष्‍ण और बलराम द्वारा उसकी सेना का संहार; मगधराज की पराजय तथा श्रीकृष्‍ण–बलराम का मथुरा में विजयी होकर लौटना 385
2 मथुरा पर जरासंध और कालयवन का आक्रमण; भगवान का युद्ध छोड़कर एक गुफा में जाना और वहां गये हुए कालयवन को मुचुकुन्‍द के दृष्टिपात से दग्‍ध कराना; मुचुकुन्‍द को वर देकर ब‍दरिकाश्रम ओर भेजना और स्‍वयं म्‍लेच्‍छ–सेना का संहार करके जरासंध के सामने से भागकर श्रीकृष्‍ण–बलराम का प्रवर्षणगिरि होते हुए द्वारका पहँचना और जरासंध का उस पर्वत को जलाकर मगध को लौट जाना 388
3 बलदेवजी का रेवती के साथ विवाह 390
4 श्रीकृष्‍ण को रुक्मिणी का संदेश; ब्राह्मण सहित श्रीकृष्‍ण कुण्डिनपुर में आगमन; कन्‍या और वर के अपने-अपने घरों में मंगलाचार; शिशुपाल के साथ आयी हुई बारात को विदर्भराज का ठहरने के लिये स्‍थान देना 392
5 रुक्मिणी की चिन्‍ता; ब्राह्मण द्वारा श्रीहरि के शुभागमन का समाचार पाकर प्रसन्‍नता; भीष्‍म द्वारा बलराम और श्रीकृष्‍ण का सत्‍कार; पुरवासियों की कामना; रुक्मिणी की कुलदेवी के पूजन के लिये यात्रा, देवी से प्रार्थना तथा सौभाग्‍यवती स्त्रियों से आशीर्वाद प्राप्त्‍िा 395
6 श्रीकृष्‍ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण तथा यादव-वीरों के साथ युद्ध में विपक्षी राजाओं की पराजय 398
7 श्रीकृष्‍ण के हाथों से रुक्मिणी की पराजय तथा द्वारका में रुक्मिणी और श्रीकृष्‍ण का विवाह 401
8 श्रीकृष्‍ण का सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के साथ विवाह और उनकी संतति का वर्णन; प्रद्यम्न का प्राकट्य तथा रति और रुक्‍म–पुत्री के साथ उनका विवाह 404
9 द्वारकापुरी के पृथ्‍वी पर आने का कारण; राजा आनर्त की तपस्‍या और उन पर भगवान श्रीकृष्‍ण की कृपा 406
10 द्वारकापुरी, गोमती और चक्रतीर्थ का महात्‍म्‍य; कुबेर के वैष्‍णवयज्ञ में दुर्वासा मुनि द्वारा घण्‍टानाद और पार्श्‍वमौलि को शाप 408
11 गज और ग्राह बने हुए मन्त्रियों का युद्ध और भगवान विष्‍णु के द्वारा उनका उद्धार 411
12 महामुनि‍ त्रित के शाप से कक्षीवान का शंक रूप होकर सरोवर में रहना और श्रीकृष्ण के द्वारा उसका उद्धार होना; शंखोद्धार-तीर्थ की महिमा 413
13 प्रभास, सरस्‍वती, बोधप्पिल और गोमती सिन्‍धु संगम का माहात्‍म्‍य 415
14 द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैव तक पर्वत का माहात्‍म्‍य 417
15 यज्ञतीर्थ, कपिटंकतीर्थ, नृगकूप, गोपीभूमि तथा गोपीचन्‍दन की महिमा; द्वारका की मिट्टी के स्‍पर्श से एक महान पापी का उद्धार 420
16 सिद्धाश्रम की महिमा के प्रसंग में श्रीराधा और गोपांगनाओं के साथ श्रीकृष्‍ण और उनकी सोलह हजार रानियों का समागम 423
17 सिद्धाश्रम में राधा और श्रीकृष्‍ण का मिलन; श्रीकृष्‍ण की रानियों का श्रीराधा को अपने शिविर में बुलाकर उनका सत्‍कार करना तथा श्रीहरि द्वारा उनकी उत्‍कृष्‍ट प्रीति का प्रकाशन 426
18 सिद्धाश्रम में व्रजांगनाओं तथा सोलह सहस्‍त्र रानियों के साथ श्‍यामसुन्‍दर की रासक्रीड़ा का वर्णन तथा श्रीराधा के मुख से वृन्‍दावन के रास की उत्‍कृष्‍टता का प्रतिपादन 429
19 लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन 432
20 इन्‍द्रतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, सूर्यकुण्‍ड नीललोहित-तीर्थ और सप्‍तसामुद्रक-तीर्थ का माहात्‍म्‍य 434
21 तृतीय दुर्ग के द्वार-देवताओं के दर्शन और पूजन की महिमा तथा पिण्‍डारक-तीर्थ का माहात्‍म्‍य 435
22 सुदामा ब्राह्मण का उपाख्‍यान 437
विश्वजित खण्‍ड
1 राजा मरुत्त का उपाख्‍यान 442
2 राजा उग्रसेन के राजसूय-यज्ञ का उपक्रम, प्रद्युम्न का दिग्विजय के लिये बीड़ा उठाना और उनका विजयाभिषेक 445
3 प्रद्युम्न के नेतृत्‍व में दिग्विजय के लिये प्रस्थित हुई यादवों की गजसेना, अश्‍वसेना तथा योद्धाओं का वर्णन 447
4 सेना सहित यादव-वीरों की दिग्विजय के लिये यात्रा 450
5 यादव-सेना की कच्‍छ और कलिंग देश पर विजय 452
6 प्रद्युम्न मरुधन्‍व देश के राजा गय को हराकर मालव नरेश तथा माहिष्‍मती पुरी के राजा से बिना युद्ध किये ही भेंट प्राप्‍त करना 454
7 गुजरात-नरेश ऋष्‍य पर विजयप्राप्‍त करके यादव-सेना का चेदिदेश के स्‍वामी दमघोष के यहां जाना; राजा का यादवों से प्रेमपूर्ण बर्ताव करने का निश्‍चय, किंतु शिशुपाल का माता-पिता के विरुद्ध यादवों से युद्ध का आग्रह 457
8 शिशुपाल के मित्र द्युमान तथा शक्‍त का वध 460
9 भानु के द्वारा रंग-पिंग का वध; प्रद्युम्न और शिशुपाल का भयंकर युद्ध तथा चेदिदेश पर प्रद्युम्न की विजय 462
10 यादव-सेना का कोंकण, कुटक, त्रिगर्त, केरल, तैलंग, महाराष्‍ट्र और कर्नाटक आदि देशों पर विजय प्राप्‍त कर करुष देश में जाना तथा वहां दन्‍तवक्र का घोर युद्ध 465
11 दन्‍तवक्र की पराजय तथा करुष देश पर यादव-सेना की विजय 469
12 उशीनर आदि देशों पर प्रद्युम्न की विजय तथा उनकी जिज्ञासा पर मुनिवर अगस्‍त्‍य द्वारा तत्‍वज्ञान प्रतिपादन 472
13 शाल्‍व आदि देशों तथा द्विविद वानर पर प्रद्युम्न की विजय; लंका से विभि‍षण का आना और उनहें भेंट समर्पित करना 476
14 सह्यपर्वत के निकट दत्तात्रेय का दर्शन और उपदेश तथा महेन्‍द्र पर्वत पर परशुरामजी के द्वारा यादव सेना का सत्‍कार और श्रेष्‍ठ भक्‍त के स्‍वरूप का निरूपण 480]]
15 उड्डीश-डामर देश के राजा, वंगदश के अधिपति वीर धन्‍वा तथा असम के नरेश पुण्‍ड्र पर यादव-सेना की विजय 484
16 मिथिला के राजा धृति द्वारा ब्रह्मचारी के रूप में पधारे हुए प्रद्युम्न का पूजन, उन दोनों का शुभ संवाद; प्रद्युम्न का राजा को प्रत्‍यक्ष दर्शन दे, उनसे पूजित हो शिविर में जाना 487
17 मगध देश पर यादवों की विजय तथा मगधराज जरासंध की पराजय 491
18 गया, गोमती, सरयू एवं गंगा के तटवर्ती प्रदेश, काशी, प्रयाग एवं विन्‍ध्‍यदेश में यादव-सेना की यात्रा; श्रीकृष्‍ण के अठारह महारथी पुत्रों का हस्‍तलाघव तथा विवाह ;मथुरा, शूरसेन जनपदों एवं नन्‍द–गोकुल में प्रद्युम्न आदि का समादर 496
19 यादव-सेना का विस्‍तार; कौरवों के पास उद्धव का दूत के रूप में जाकर प्रद्युम्न का संदेश सुनाना; कौरवों के कटु उत्तर से रुष्‍ट यादवों की हस्तिनापुर पर चढ़ाई 500
20 कौरवों की सेना का युद्धभूमि में आना; दोनों ओर के सैनिकों का तुमुल युद्ध और प्रद्युम्न के द्वारा दुर्योधन की पराजय 503
21 कौरव तथा यादव वीरों का घमासान युद्ध; बलराम और श्रीकृष्‍ण का प्रकट होकर उनमें मेल कराना 507
22 अर्जुन सहित प्रद्युम्न का कालयवन-पुत्र चण्‍ड को जीतकर भारतवर्ष के बाहर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रस्‍थान 511
23 यादव-सेना का बाणासुर से भेंट लेकर अलकापुरी को प्रस्‍थान तथा यादवों और यक्षों का युद्ध 503
24 यादव सेना और यक्ष सेना का घोर युद्ध 519
25 प्रद्युम्न का एक युक्ति के द्वारा गणेशजी को रणभूमि से हटाकर गुह्यक सेना पर विजय प्राप्‍त करना और कुबेर का उनके लिये बहुत-सी भेंट-सामग्री देकर उनकी स्‍तुति करना; फिर प्राग्‍ज्‍योतिषपुर में भेंट लेकर प्रद्युम्न का विरोधी वानर द्विविद को किष्किन्‍धा में फेंक देना 523
26 किम्‍पुरुष वर्ष के रंगवल्‍लीपुर में किम्‍पुरुषों द्वारा हरिचरित्र का गान; वहां के राजा द्वारा भेंट पाकर यादव सेना का आगे जाना; मार्ग में अजगररूपधारी शापभ्रष्‍ट गन्‍धर्व का उद्धार; वसन्‍त तिल का पुरी के राजा श्रृंगार तिलक को पराजित करके प्रद्युम्न का हरिवर्ष के लिये प्रस्‍थान 532
27 प्रद्युम्न द्वारा गरुडास्‍त्र का प्रयोग होने पर गीधों के आक्रमण से यादव-सेना की रक्षा; दशार्ण देश पर विजय तथा दशार्ण मोचन तीर्थ में स्‍न्नान 532
28 उत्तर कुरु वर्ष पर यादवों की विजय; वाराहीपुरी में राजा गुणाकर द्वारा प्रद्युम्न का समादर 534
29 प्रद्युम्न की हिरण्‍मयवर्ष पर विजय; मधुमक्खियों और वानरों के आक्रमण से छुटकारा; राजा देवसख से भेंट की प्राप्ति तथा चन्‍द्रकान्‍ता नदी में स्‍न्नान 538
30 रम्‍यक वर्ष में कलंक राक्षस पर विजय; नै:श्रेयसवन, मानवी नगरी तथा मानव गिरि का दर्शन; श्राद्धदेव मनु द्वारा प्रद्युम्न की स्‍तुति 540
31 रम्‍यक वर्ष में मन्‍मथशालिनी पुरी के लोगों द्वारा श्रीकृष्‍ण लीला का गान; प्रजापति व्‍यति संवत्‍सर द्वारा प्रद्युम्न का पूजन; कामवन में प्रद्युम्न का अपने कामदेव- स्‍वरूप में विलय 543
32 भद्राश्व वर्ष में भद्रश्रवा के द्वारा प्रद्युम्न का पूजन तथा स्‍तवन; यादव-सेना की चन्‍द्रावती पुरी पर चढ़ाई; श्री कृष्‍ण कुमार वृक के द्वारा हिरण्‍याक्ष-पुत्र हृष्‍ट का वध 547
33 संग्रामजित के हाथ से भूत-संतापन का वध 550
34 अनिरुद्ध के हाथ से वृक दैत्‍य का वध 554
35 साम्‍ब द्वारा कालनाभ दैत्‍य का वध 547
36 दीप्तिमान द्वारा महानाभ का वध 558
37 श्रीकृष्‍ण-पुत्र भानु के हाथ से हरिश्‍मश्रु दैत्‍य का वध 559
38 प्रद्युम्न और शकुनि के घोर युद्ध का वर्णन 561
39 शकुनि के मायामय अस्‍त्रों का प्रद्युम्न द्वारा निवारण तथा उनके चलाये हुए श्रीकृष्‍णास्‍त्र से युद्धस्‍थल में भगवान श्रीकृष्‍ण का प्रादुर्भाव 564
40 शकुनि के जीवस्‍वरूप शुक का निधन 568
41 शकुनि का घोर युद्ध, सात बार मारे जाने पर भी उसका भूमि के स्‍पर्श से पुन: जी उठना; अन्‍त में भगवान श्रीकृष्‍ण द्वारा युक्तिपूर्वक उसका वध 571
42 श्रीकृष्‍ण का यादवों के साथ चन्‍द्रावतीपुरी में जाकर शकुनि-पुत्र को वहां का राज्‍य देना तथा शकुनि आदि के पूर्व जन्‍मों का परिचय 574
43 इलावृत वर्ष में राजा शोभन से भेंट की प्राप्ति; स्‍वायम्‍भुव मनु की तपोभूमि में मूर्तिमती सिद्धियों का निवास; लीलावतीपुरी में अग्न‍िदेव से उपायन की उपलब्धि; वेदनगर में मूर्तिमान वेद, राग, ताल, स्‍वर, ग्राम और नृत्‍य के भेदों का वर्णन 576
44 रागिनियों तथा राग पुत्रों के नाम और वेद आदि के द्वारा भगवान का स्‍तवन 579
45 रागिनियों तथा राग-पुत्रों द्वारा भगवान श्रीकृष्‍ण का स्‍तवन और उनका द्वारकापुरी के लिये प्रस्‍थान 582
46 यादवों और गन्‍धर्वों का युद्ध, बलभद्रजी का प्राकटय, उनके द्वारा गन्‍धर्व सेना का संहार, गन्‍धर्वराज की पराजय, वसन्‍तमालती नगरी का हल द्वारा कर्षण; गन्‍धर्वराज का भेंट लेकर शरण में आना और उन पर बलराम जी की कृपा 585
47 यादव सेना के साथ शक्रसख का युद्ध और उसकी पराजय 564
48 शक्रसख का प्रद्युम्न को भेंट अर्पण, प्रद्युम्न का लीलावतीपुरी के स्‍वयंवर में सुन्‍दरी को प्राप्‍त करना तथा इलावृत वर्ष से लौटकर भारत एवं द्वारकापुरी में आना 590
49 राजसूय यज्ञ में ऋषियों, ब्राह्मणों, राजाओं, तीर्थों, क्षेत्रों, देवगणों तथा सुहृद् सम्‍बन्धियों का शुभागमन 594
50 राजसूय यज्ञ का मंगलमय उत्‍सव; देवताओं, ब्राह्मणों तथा अतिथियों का दान-मान से सत्‍कार 585
बलभद्र खण्‍ड
1 श्री बलभद्र जी के अवतार का कारण 597
2 श्री बलभद्र जी के अवतार की तैयारी 599
3 ज्‍योतिष्‍मती का उपाख्‍यान 601
4 रेवती का उपाख्‍यान 603
5 श्रीबलराम और श्रीकृष्‍ण का प्राकटय 607
6 प्राडविपाक मुनि के द्वारा श्रीराम - कृष्‍ण की व्रजलीला का वर्णन 610
7 श्रीराम-कृष्‍ण की मथुरा-लीला का वर्णन 612
8 श्रीराम-कृष्‍ण की द्वारका-लीला का वर्णन 615
9 श्री बलराम जी की रासलीला का वर्णन 618
10 श्री बलभद्र जी की पूजा-पद्धति और पटल 620
11 श्री बलराम-स्‍तोत्र 623
12 श्री बलराम-कवच 624
13 बलभद्र सहस्‍त्रनाम 625
विज्ञान खण्‍ड
1 द्वारका में वेदव्‍यासजी का आगमन और उग्रसेन द्वारा उनका स्‍वागत-पूजन 585
2 व्‍यास जी के द्वारा गतियों का निरूपण 649
3 सकाम एवं निष्‍काम भक्ति योग का वर्णन 651
4 भक्त-संत की महिमा का वर्णन 552
5 भक्ति की महिमा का वर्णन 655
6 मन्दिर निर्माण तथा विग्रह प्रतिष्‍ठा एवं पूजा की विधि 556
7 नित्‍यकर्म और पूजा-विधि का वर्णन 585
8 पूजा-विधि का वर्णन 660
9 पूजोपचार तथा पूजन प्रकार का वर्णन 661
10 परमात्‍मा का स्‍वरूप-निरूपण 667
अश्‍वमेध खण्‍ड
1 अश्‍वमेध-कथा का उपक्रम; गर्ग वज्रनाभ संवाद 671
2 श्रीकृष्‍णावतार की पूर्वार्द्धगत लीलाओं का संक्षेप से वर्णन 674
3 जरासंध के आक्रमण से लेकर पारि‍जात-हरण तक की श्रीकृष्‍ण लीलाओं का संक्षि‍प्‍त वर्णन 677
4 पारि‍जात हरण 679
5 देवराज और उसकी देवसेना के साथ श्रीकृष्‍ण का युद्ध तथा वि‍जयलाभ; पारि‍जात का द्वारकापुरी में आरोपण 681
6 श्रीकृष्‍ण के अनेक चरि‍त्रों का संक्षेप से वर्णन 684
7 देवर्षि‍ नारद का ब्रह्मलोक से आगमन; राजा उग्रसेन द्वारा उनका सत्‍कार; देवर्षि‍ द्वारा अश्‍वमेध यज्ञ की महत्ता का वर्णन; श्रीकृष्‍ण की अनुमति‍ एवं नारद जी द्वारा अश्‍वमेध यज्ञ की वि‍धि‍ का वर्णन 686
8 यज्ञ के योग्‍य श्‍यामकर्ण अश्‍व का अवलोकन 689
9 गर्गाचार्य का द्वारकापुरी में आगमन तथा अनि‍रूद्ध का अश्‍वमेधीय अश्‍व की रक्षा के लि‍ए कृतप्रति‍ज्ञ होना 690
10 उग्रसेन की सभा में देवताओं का शुभागमन; अनि‍रूद्ध के शरीर में चन्‍द्रमा और ब्रह्मा का वि‍लय तथा राजा और रानी की बातचीत 692
11 ऋत्‍वि‍जों का वरण-पूजन; श्‍यामकर्ण अश्‍व का आनयन और अर्चन; ब्राह्मणों को दक्षि‍णादान; अश्‍व के भालदेश में बँधे हुए स्‍वर्णपत्र पर गर्गजी के द्वारा उग्रसेन के बल-पराक्रम का उल्‍लेख तथा अनि‍रूद्ध को अश्‍व की रक्षा के लि‍ए आदेश 694
12 अश्र्वमोचन तथा उसकी रक्षा के लि‍ये सेनापति‍ अनि‍रूद्ध का वि‍जयाभि‍षेक 697
13 अनि‍रूद्ध का अन्‍त:पुर से आज्ञा लेकर अश्व की रक्षा के लि‍ये प्रस्‍थान; उनकी सहायता के लि‍ये साम्‍ब का कृतप्रति‍ज्ञ होना; लक्ष्‍मणा का उन्‍हें सम्‍मुख युद्ध के लि‍ये प्रोत्‍साहन देना; श्रीकृष्‍ण के भाइयों और पुत्रों का भी श्रीकृष्‍ण की आज्ञा से प्रस्‍थान करना तथा यादवों की चतुरंगि‍णी सेना का वि‍स्‍तृत वर्णन 698
14 अनिरुद्ध का सेना सहित अश्व की रक्षा के लिए प्रयाण, माहिष्मतीपुरी के राजकुमार का अश्व को बांधना तथा अनिरुद्ध का राजा इंद्रनील से युद्ध के लिए उद्यत होना 702
15 अनिरुद्ध और साम्बका शौर्य, माहिष्मती नरेश पर इनकी विजय 705
16 चम्पावतीपुरी के राजा द्वारा अश्व का पकड़ा जाना, यादवों के साथ हेमांगद के सैनिकों का घोर युद्ध, अनिरुद्ध और श्रीकृष्ण पुत्रों के शौर्य से पराजित राजा का उनकी शरण में आना 707
17 स्त्री राज्य पर विजय और वहां की कुमारी रानी सुरूपा का अनिरुद्ध की प्रिया होने के लिए द्वारका को जाना 710
18 राक्षस भीषण द्वारा यज्ञीय अश्व का अपहरण तथा विमान द्वारा यादव–वीरों की उपलंका पर चढ़ाई 713
19 यादवों और निशाचरों का घोर युद्ध, अनिरुद्ध और भीषण की मूर्च्छा तथा चेतना एवं रणभूमि में बक का आगमन 715
20 बक और भीषण की पराजय तथा यादवों का घोड़ा लेकर आकाश मार्ग से लौटना 717
21 भद्रावतीपुरी तथा राजा योवनाश्व पर अनिरुद्ध की विजय 720
22 यज्ञ के घोड़े का अवन्तीपुरी में जाना और वहां अवन्ती नरेश की ओर से सेना सहित यादवों का पूर्ण सत्कार होना 721
23 अनिरुद्ध के पूछने पर सान्दीपनि द्वारा श्री कृष्ण–तत्त्व का निरूपण, श्रीकृष्ण की परब्रह्मता एवं भजनीयता का प्रतिपादन करके जगत से वैराग्य और भगवान के भजन का उपदेश 723
24 अनुशाल्व और यादव वीरों में घोर युद्ध 725
25 अनुशाल्व द्वारा प्रद्युम्न को उपहार सहित अश्व का अर्पण तथा बल्वल दैत्य द्वारा उस अश्व का अपहरण 728
26 नारदजी के मुख से बल्वल के निवास स्थान का पता पाकर यादवों का अनेक तीर्थों में स्नान–दान करते हुए कपिलाश्रम तक जाना और वहां कपिल मुनि को प्रणाम करके सागर के तट पर सेना का पड़ाव डालना 730
27 यादवों द्वारा समुद्र पर बाणमय सेतु का निर्माण 732
28 यादवों का पांचजन्य उपद्वीप में जाना, दैत्यों की परस्पर मंत्रणा, मयासुर का बल्वल को घोड़ा लौटा देने के लिए सलाह देना, परंतु बल्वल का युद्ध के निश्चय ही अडिग रहना 730
29 यादवों और असुरों का घोर संग्राम तथा ऊर्ध्वकेश एवं अनिरुद्ध का द्वंद्व युद्ध 736
30 उर्ध्वकेश और अनिरुद्ध का तथा नद और गद का घोर युद्ध, उर्ध्वकेश और नद का वध 739
31 वृक द्वारा सिंह का और साम्ब द्वारा कुशाम्ब का वध 742
32 मय को बल्वल का समझाना, बल्वल की युद्ध घोषणा, समस्त दैत्यों का युद्ध के लिए निर्गमन, विलम्ब के कारण सैन्यपाल के पुत्र का वध तथा दु:खी सैन्य पाल को मंत्रीपुत्रों का विवेकपूर्वक धैर्य बंधाना 744
33 श्रीकृष्ण की कृपा से दैत्य राजकुमार कुनंदन के जीवन की रक्षा 747
34 दैत्यों और यादवों का घोर युद्ध, बल्वल, कुनंदन तथा अनिरुद्ध के अद्भुत पराक्रम 751
35 बल्वल के चारों मंत्रीकुमारों का वध, बल्वल द्वारा मायामय युद्ध तथा अनिरुद्ध के द्वारा उसकी पराजय 754
36 श्रीकृष्ण पुत्र सुनंदन द्वारा दैत्यपुत्र कुनंदन का वध 758
37 भगवान शिव का अपने गणों के साथ बल्वल की ओर से युद्धस्थल में आना और शिवगणों तथा यादवों का घोर युद्ध, दीप्तिमान का शिवगणों को मार भगाना और अनिरुद्ध का भैरव को जृम्भणास्त्र से मोहित करना 761
38 नन्दिकेश्वर द्वारा सुनंदन का वध, भगवान शिव के त्रिशूल से आहत हुए अनिरुद्ध की मूर्च्छा, साम्ब द्वारा शिव की भर्त्सना, साम्ब और शिव का युद्ध तथा रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण का शुभागमन 764
39 भगवान शंकर द्वारा श्रीकृष्ण का स्तवन, शिव और श्रीकृष्ण की एकता, श्रीकृष्ण द्वारा सुनंदन, अनिरुद्ध एवं अन्य सब यादवों को जीवनदान देना तथा बल्वल द्वारा यज्ञ संबंधी अश्व का लौटाया जाना 761
40 यज्ञ संबंधी अश्व का ब्रजमंडल में वृंदावन के भीतर प्रवेश, श्रीदामा का उसे बांधकर नंदजी के पास ले जाना, नंदजी का समस्त यादवों और श्रीकृष्ण से सानंद मिलना, यादव सेना का वृंदावन में और श्रीकृष्ण का नंदपत्तन में निवास 770
41 श्रीराधा और श्रीकृष्ण का मिलन 773
42 रासक्रीड़ा के प्रसंग में श्रीवृंदावन, यमुना–पुलिन, वंशीवट, निकुंज भवन आदि की शोभा का वर्णन, गोप सुन्‍दरियों, श्यामसुंदर तथा श्रीराधा की छबि का चिंतन 775
43 श्रीकृष्ण का श्रीराधा और गोपियों के साथ विहार तथा मानवती गोपियों के अभिमानपूर्ण वचन सुनकर श्रीराधा के साथ उनका अन्तर्धान होना 782
44 गोपियों का श्रीकृष्ण को खोजते हुए वंशीवट के निकट आना और श्रीकृष्ण का मानवती राधा को त्याग कर अन्तर्धान होना 784
45 गोपांगनाओं द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए उनका आह्वान और श्रीकृष्ण का उनके बीच में आविर्भाव 787
46 श्रीकृष्ण के आगमन से गोपियों को उल्लास, श्रीहरि के वेणुगीत की चर्चा से श्रीराधा की मूर्च्छा का निवारण, श्रीहरि का श्रीराधा आदि गोप सुंदरियों के साथ वन विहार, स्थल विहार, जल विहार, पर्वत विहार और रास क्रीड़ा 789
47 श्रीकृष्ण सहित यादवों का व्रजवासियों को आश्वासन देकर वहां से प्रस्थान 792
48 अश्व का हस्तिनापुर में जाना, उसके भालपत्र को पढ़कर दुर्योधन आदि का रोषपूर्वक अश्व को पकड़ लेना तथा यादव सैनिकों का कौरवों को घायल करना 794
49 यादवों और कौरवों का घोर युद्ध 797
50 कौरवों की पराजय और उनका भगवान श्रीकृष्ण से मिलकर भेंट सहित अश्व को लौटा देना 800
51 यादवों का द्वैतवन में राजा युधिष्ठिर से मिल कर घोड़े के पीछे–पीछे अन्यान्य देशों में जाना तथा अश्व का कौन्तलपुर में प्रवेश 804
52 श्यामकर्ण अश्व का कौन्तलपुर में जाना और भक्तराज चंद्रहास का बहुत सी भेंट सामग्री के साथ अश्व को अनिरुद्ध की सेवा में अर्पित करना और वहां से उन सबका प्रस्थान 807
53 उद्धव की सलाह से समस्त यादवों का द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान तथा अनिरुद्ध की प्रेरणा से उद्धव का पहले द्वारकापुरी में पहुंचकर यात्रा का वृत्तांत सुनाना 809
54 वसुदेव आदि के द्वारा अनिरुद्ध की अगवानी, सेना और अश्व सहित यादवों का द्वारकापुरी में लौटकर सबसे मिलना तथा श्रीकृष्ण और उग्रसेन आदि के द्वारा समागत नरेशों का सत्कार 812
55 व्‍याजी का मुनि-दम्‍पति‍ तथा राज दम्‍पतियों को गोमती का जल लाने के लिए आदेश देना, नारदजी का मोह और भगवान द्वाराउस मोह का भंजन, श्रीकृष्‍ण की कृपा से रानियों का कलश में जल भरकर लाना 815
56 राजा द्वारा यज्ञ में विभिन्रन बन्धु-बान्धवों को भिन्न-भिन्न कार्यों में लगना, श्रीकृष्‍ण का ब्राह्मणों के चरण पखारना, घी की आहुति से अग्निदेव को अजीर्ण होना, यज्ञपशु के तेज का श्रीकृष्‍ण में प्रवेश, उसके शरीर का कर्पूर के रूप में परिवर्तन, उसकी आहुति और यज्ञ की समाप्ति पर अवभृथ स्नान 819
57 ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा-दान, पुरस्‍कार-वितरण, संबंधियों का सम्मान तथा देवता आदि सबका अपने अपने निवास स्‍‍थान को प्रस्‍थान 821
58 श्रीकृष्‍ण द्वारा कंस आदि का आवाहन और उनका श्रीकृष्‍ण को ही परमपिता बताकर इस लोक के माता-पिता से मिले बिना ही वैकुण्‍ठलोक को प्रस्‍थान 819
59 गर्गाचार्य के द्वारा राजा उग्रसेन के प्रति भगवान श्रीकृष्‍ण के सहस्त्रनामों का वर्णन 819
60 कौरवों के संहार, पाण्‍डवों के स्‍वर्गगमन तथा यादवों के संहार आदि का संक्षिप्‍त वृत्‍तान्‍त; श्रीराधा तथा व्रजवासियों सहित भगवान श्रीकृष्‍ण का गोलोकधाम में गमन 827
61 भगवान के श्‍यामवर्ण होने का रहस्‍य; कलियुग की पापमयी प्रवृत्‍ति; उससे बचने के लिये श्रीकृष्‍ण की समाराधना तथा एकादशी-व्रत का माहात्‍म्‍य 829
62 गुरु और गंगा की महिमा; श्रीवज्रनाभ द्वारा कृतज्ञता-प्रकाशन और गुरुदेव का पूजन तथा श्रीकृष्‍ण के भजन-चिन्‍तन एवं गर्ग संहिता का माहात्‍म्‍य 833
माहात्‍म्‍य
1 गर्ग संहिता के प्राकटय का उपक्रम 837
2 नारद जी की प्रेरणा से गर्ग द्वारा संहिता की रचना; संतान के लिये दु:खी राजा प्रतिबाहु के पास महर्षि शाण्‍डिल्‍य का आगमन 839
3 राजा प्रतिबाहु के प्रति महर्षि शाण्‍डिल्‍य द्वारा गर्गसंहिता के माहात्‍म्‍य और श्रवण-विधि का वर्णन 841
4 शाण्‍डिल्‍य मुनि का राजा प्रतिबाहु को गर्गसंहिता सुनाना; श्रीकृष्‍ण प्रकट होकर राजाको वरदान देना; राजाको पुत्र की प्राप्‍ति और संहिता का माहात्‍म्‍य 843

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